आजादी के 80 साल बाद भी भारतीय न्याय व्यवस्था में अंग्रेजी का वर्चस्व क्यों? Allahabad High Court के जज ने उठाए हिंदी और भारतीय भाषाओं के सम्मान पर सवाल
Allahabad High Court के एक न्यायाधीश ने अदालतों में अंग्रेजी के वर्चस्व और भारतीय भाषाओं के सीमित इस्तेमाल पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं।

एक वीडियो आजकल इंटरनेट पर काफी वायरल हो रहा है, जिसमें Allahabad High Court के एक जज ने भाषाई गुलामी को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। उनका कहना था कि आजादी के लगभग 80 साल बाद भी हम उन भाषाओं के प्रभाव से बाहर क्यों नहीं निकल पाए हैं, जो कभी हम पर शासन करने वालों की भाषाएं थीं? आखिर आज भी हम उन्हीं भाषाओं का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं? भारतीय न्याय व्यवस्था में अंग्रेजी को आज भी इतना महत्व क्यों दिया जाता है और उसका इतना प्रभाव क्यों बना हुआ है?
पाठकों के लिए यह जानना जरूरी है कि भारत के High Courts और Supreme Court में आज भी न्यायिक कामकाज और फैसलों की मुख्य भाषा अंग्रेजी ही है। हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल अभी भी काफी सीमित है।
वास्तविकता यह भी है कि हमारी न्याय व्यवस्था में अंग्रेजी बोलने और लिखने वाले वकीलों को अक्सर ज्यादा सम्मान और प्रतिष्ठा दी जाती है, जबकि हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं में अपनी बात रखने वाले वकीलों को कभी-कभी कमतर समझा जाता है।
यह स्थिति केवल हिंदी तक ही सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में, खासकर क्षेत्रीय भाषाओं वाले राज्यों में भी भाषा को लेकर ऐसी मानसिकता अक्सर देखने को मिलती है।
हालांकि, यह बात भी गौर करने लायक है कि District Courts में आज भी हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में कामकाज होता है, लेकिन High Courts और Supreme Court में अंग्रेजी का प्रभाव साफ दिखाई देता है।
इसी मुद्दे पर न्यायाधीश ने अपने बयान में भारतीय भाषाओं के सम्मान और अदालतों में उनके इस्तेमाल की जरूरत पर जोर दिया। उनका पूरा बयान शब्दशः यहां प्रस्तुत है।
न्यायाधीश का पूरा वक्तव्य
“ऐसा जब मैं कहता हूँ, तो समाज में कुछ इस तरह की बात जाती है कि शायद मैं किसी भाषा का विरोध कर रहा हूँ।
मेरा दुनिया की किसी भाषा से कभी कोई राग-द्वेष और विरोध नहीं रहा है। लेकिन ये सारी भाषाएँ हमारी मौसियाँ हो सकती हैं। हमारी अंग्रेजी जो है, वो विलायत वाली मौसी हो सकती है।
मौसियों का खूब सम्मान हो, मुझे कोई बुरा नहीं लगेगा। लेकिन भारत भारती भाषा, अपनी माँ का अपमान होते देख मुझे चोट और आघात पहुँचता है।
इसलिए मैं ये कहता हूँ कि बंगाल में, जैसा मैंने पहले ही कहा, बंगाली में निर्णय मिले तो अति उत्तम होगा। गुजरात में गुजराती में मिले तो अति उत्तम होगा। और जो हिंदी भाषी प्रांत हैं, उनमें हिंदी का प्रचलन ला सकते हैं।
मैं तो यहाँ पर यह भी उल्लेख करूँगा कि मेरे बहुत से भ्राता-अनुज हैं, जो जिला न्यायालयों से आए हैं। मैंने कई लोगों के जजमेंट और ऑर्डर पढ़े हैं, जो हिंदी में हैं।
जब मैं आपराधिक अपीलों की सुनवाई करता था, तब सैकड़ों ट्रायल के निर्णय हिंदी में लिखे हुए देखे हैं।
अगर आप वहाँ हिंदी में लिखकर आ सकते हैं, तो मेरा आप सबसे विशेष अनुरोध है कि आप यहाँ भी हिंदी को बनाए रखिए।
आप ऐसा क्यों महसूस करते हैं कि उच्च न्यायालय में आने के बाद मुझे अंग्रेजी में ही निर्णय और जजमेंट देने चाहिए?
इसमें कहीं कोई दिक्कत नहीं है। यह हमारे मन के अंदर बैठी एक भावना है कि शायद अंग्रेजी में जजमेंट बहुत सुंदर दिखता है।
ऐसा नहीं है।
हम हिंदी में भी अपनी बात कह सकते हैं।
इस पर जोर देते हुए मैं एक बात कहना चाहता हूँ कि हम संवैधानिक तौर पर, भौगोलिक तौर पर अंग्रेजों से आजाद हो गए हैं, लेकिन 80 साल होने जा रहे हैं। हम अभी अंग्रेजी भाषा से अपने आपको आजाद और मुक्त नहीं कर पाए हैं।
यह एक ऐसा बिंदु है, जिस पर प्रत्येक भारतीय को विचार करना चाहिए कि 80 साल बाद भी हम उस भाषा के अधीन क्यों हैं, जिसने हम पर 300 साल राज किया।
ये ऐसे प्रश्न हैं, जिन पर विचार होना चाहिए।
इसीलिए मैं कहता हूँ—
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए……..”
